रविवार, 7 दिसंबर 2014

राष्ट्र के लिये निजी स्वार्थों का त्याग


रूस में जब क्रान्ति होकर चुकी तो नव निर्माण के लिये मशीनों की जरूरत पड़ी। मशीनें विदेशों से खरीदनी थीं। इसके लिए बदले में रूसियों को अपने यहाँ का कच्चा माल देना था। उन दिनों पशु और उनसे उत्पन्न होने वाली चीजें ही रूस के पास थीं जो बाहर भेजी जा सकती थीं। निदान उस देशवासियों ने स्वयं उनके बिना काम चलाने और दूध, मक्खन, माँस, खल, ऊन आदि चीजें बाहर भेजने का निश्चय किया। वह सब बाहर भेजा गया और मशीनें आईं। दस साल तक रूसियों ने बिना इन चीजों के काम चलाया। रूस भोजन और मोटे कपड़े पर गुजारा किया। यह बड़ाई ड़ड़डड़़ प्रिंस क्रोपाटकिन को भी दूध उपलब्ध न हो सका।

अंग्रेजी सेना जुडेफन के मैदान में लड़ रही थीं। सेनापति फिलिप सिडनी की जाँघ में गोली लगी। वे घायल होकर गिर पड़े। प्यास से उनका गला सुख रहा था। पानी की बोतल निकाल कर वे पीने ही वाले थे कि पास में पड़े एक दूसरे सैनिक को देखा जो उन्हीं की तरह घायल पड़ा था और बहुत खून निकलने से मरणासन्न दशा का पहुँच गया था। देखने से मालूम पड़ता था कि प्यासा वह भी बहुत है। फिलिप ने खिसक कर अपने हाथ की बोतल उसके मुँह में उड़ेल दी और कहा-मेरी अपेक्षा पानी की तुम्हें आवश्यकता अधिक हैं।

सुकरात को जब विष पिलाने की तैयारी हो रही थी तब उसे अपने एक कर्जदार का स्मरण आया जिससे एक मुर्गा उसने उधार लिया था। उसने अपने उत्तराधिकारियों को कहा-उस कर्जदार का कर्ज जरूर चुका देना। मैं ऋणी होकर नहीं मरना चाहता।

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