आरोग्य ही नहीं, मन को वासना सक्त होने से रोकने की दृष्टि से भी यह आवश्यक हैं कि स्वादेन्द्रिय पर अंकुश लगाया जाय। इस दृष्टि से नमक और मीठा दोनों को ही छोड़ देना अच्छा रहता हैं। यह निराधार भय है कि इससे स्वास्थ्य खराब हो जाएगा । सत्य तो यह है कि इस संयम से पाचन क्रिया ठीक होती हैं, रक्त शुद्ध होता हैं, इन्द्रियाँ सशक्त रहती हैं, तेज बढ़ता हैं और जीवन-काल बढ़ जाता हैं। इनसे भी बढ़ा लाभ यह है कि मन काबू में आता हैं। चटोरेपन को रोक देने से वासना पर जो नियंत्रण होता है वह धीरे-धीरे सभी इन्द्रियों को वश में करने वाला सिद्ध होता हैं। जिस प्रकार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों में स्वादेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय ही प्रबल हैं, उसी प्रकार स्वाद के षट् रसों में नमक और मीठा ही प्रधान हैं। चटपटा, खट्टा, कसैला आदि तो उनके सहायक रस मात्र हैं। इन दो प्रधान रसों पर संयम प्राप्त करना षट् रसों को त्यागने के बराबर ही हैं। जिसने स्वाद और काम-प्रवृत्ति को जीता उसकी सभी इन्द्रियाँ वश में हो गई । जिसने नमक, मीठा छोड़ा, उसने छहों रसों को त्याग दिया, ऐसा ही समझना चाहिए। मन को वश में करने के लिए यह संयम-साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही होती हैं।
हमें भी इस दिशा में एक कदम उठाना ही चाहिए। आरम्भ में वह छोटा हो तो भी हर्ज नहीं। सप्ताह में एक दिन अस्वाद व्रत रखना किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए। रविवार या गुरुवार के दिन इसके लिए अधिक उपयुक्त हैं। उस दिन जो भी भोजन किया जाय उसमें नमक मीठा मिला हुआ न हो। उबले हुए आलू, टमाटर, दही, दूध उबले हुए अन्य शाक, बिना नमक, मसाले की अलौनी दाल आदि क साथ रोटी खा लेना बिलकुल साधारण सी बात हैं। दो चार बार चटोरापन की पुरानी आदत के अनुसार अखरेगा तो सही पर सन्तोष और धैर्य पूर्वक उस भोजन को भूख बुझाने जितनी मात्रा में आसानी से खाया जा सकेगा। दो चार बार के अभ्यास से तो वह अलौना भोजन ही स्वादिष्ट लगने लगेगा। अलौनेपन का अपना एक अलग ही स्वाद है और वह जिन्हें पसन्द आ जाता है उन्हें दूसरे स्वाद रचते ही नहीं।
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