अपने सुख के लिए दूसरों के दुःख नहीं
सेवा ग्राम में गाँधी जी के पास एक कुष्ठ
रोगी परचुरे शास्त्री रहते थे। उनके कुष्ठ रोग के
लिए किसी ने दवा बताई कि- एक
काला साँप लेकर हाँडी में बंद किया जाय
फिर उस हाँडी को कई घंटे उपलों की आग में
जलाया जाय। जब साँप की भस्म हो जाय
तो उसे शहद में मिलाकर खाने से कुष्ठ
अच्छा हो जायेगा। गाँधी जी ने पूछा-
‘क्या आप ऐसी दवा खाने को तैयार है?’
शास्त्री जी ने उत्तर दिया- बापू!
यदि साँप की जगह मुझे ही हांडी में बन्द करके
जला दिया जाय तो क्या हानि है? साँप ने
क्या अपराध किया है कि उसे इस प्रकार
जलाया जाय?
परचुरे शास्त्री की वाणी में उस दिन
मानवता की आत्मा बोली थी। वे लोग
जो पशु पक्षियों का माँस खाकर अपना माँस
बढ़ाना चाहते हैं, इस मानवता की पुकार
को यदि अपने बहरे कानों से सुन पाते
तो कितना अच्छा होता।
सेवा ग्राम में गाँधी जी के पास एक कुष्ठ
रोगी परचुरे शास्त्री रहते थे। उनके कुष्ठ रोग के
लिए किसी ने दवा बताई कि- एक
काला साँप लेकर हाँडी में बंद किया जाय
फिर उस हाँडी को कई घंटे उपलों की आग में
जलाया जाय। जब साँप की भस्म हो जाय
तो उसे शहद में मिलाकर खाने से कुष्ठ
अच्छा हो जायेगा। गाँधी जी ने पूछा-
‘क्या आप ऐसी दवा खाने को तैयार है?’
शास्त्री जी ने उत्तर दिया- बापू!
यदि साँप की जगह मुझे ही हांडी में बन्द करके
जला दिया जाय तो क्या हानि है? साँप ने
क्या अपराध किया है कि उसे इस प्रकार
जलाया जाय?
परचुरे शास्त्री की वाणी में उस दिन
मानवता की आत्मा बोली थी। वे लोग
जो पशु पक्षियों का माँस खाकर अपना माँस
बढ़ाना चाहते हैं, इस मानवता की पुकार
को यदि अपने बहरे कानों से सुन पाते
तो कितना अच्छा होता।
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